विष्णु के 10 मुख्य अवतार (दशावतार): नरसिंह अवतार (मानव-शेर -भाग 4
नरसिंह अवतार (मानव-शेर) भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों (दशावतार) में से चौथा और अत्यंत शक्तिशाली अवतार है, जो आधे नर (मनुष्य) और आधे सिंह (शेर) के रूप में प्रकट हुए थे। यह अवतार अत्याचार के अंत और धर्म की पुनर्स्थापना का प्रतीक है।
नरसिंह अवतार का उद्देश्य और कथा:
- भक्त प्रहलाद की रक्षा: राक्षसराज हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान पाया था कि उसे न कोई मानव मार सके न पशु, न घर के अंदर न बाहर, न दिन में न रात में, और न किसी अस्त्र से न शस्त्र से।
- अत्याचार का अंत: वरदान पाकर अहंकारी हिरण्यकशिपु ने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया और विष्णु भक्त अपने ही पुत्र प्रहलाद को मारने का प्रयास किया।
- अवतार का रूप: अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु खंभे को फाड़कर प्रकट हुए, जो न पूरी तरह इंसान थे न जानवर (अर्ध-मानव, अर्ध-सिंह)।
- हिरण्यकशिपु का वध: भगवान नरसिंह ने शाम के समय (न दिन न रात), घर की दहलीज पर (न अंदर न बाहर), अपनी गोद में रखकर (न जमीन पर न आकाश में), अपने पंजों से (न अस्त्र न शस्त्र) हिरण्यकशिपु का वध किया।
मुख्य विवरण:
- रूप: नर (मनुष्य) का शरीर और सिंह का सिर व पंजे।
- अवतार तिथि: वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को नरसिंह जयंती मनाई जाती है।
- महत्व: यह अवतार अन्याय पर न्याय की और अहंकार पर भक्ति की विजय का प्रतीक है।
नरसिंह अवतार की पौराणिक कथा:
- हिरण्यकश्यप का वरदान:राक्षस हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर वरदान मांगा था कि उसे न कोई मनुष्य मार सके न पशु, न घर के अंदर न बाहर, न दिन में न रात में, न अस्त्र से न शस्त्र से, और न धरती पर न आकाश में। इस वरदान के कारण वह अजेय हो गया और स्वयं को भगवान मानने लगा
।
- भक्त प्रह्लाद की परीक्षा:हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, जिसे हिरण्यकश्यप मारना चाहता था। प्रह्लाद को मारने के लिए होलिका (हिरण्यकश्यप की बहन) को अग्नि में न जलने का वरदान था, लेकिन वह भक्त प्रह्लाद की जगह खुद जल गई।
- नरसिंह रूप में भगवान विष्णु:जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा कि उसका भगवान कहाँ है, तो प्रह्लाद ने कहा कि प्रभु सर्वत्र हैं। क्रोधित होकर जब हिरण्यकश्यप ने एक खंभे पर तलवार से प्रहार किया, तो भगवान विष्णु खंभे को फाड़कर नरसिंह रूप में प्रकट हुए।
- हिरण्यकश्यप का वध:भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप को घर की दहलीज पर, अपनी गोद में रखकर, अपने तीखे नाखूनों से उसका वध कर दिया। उन्होंने उसे सुबह-शाम के बीच के समय (प्रदोष काल) में मारा, जो न दिन था न रात।

